वैसे तो मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद विजय रूपाणी ने संगठन में काम करने की इच्छा जताई है, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी होने की उम्मीद बहुत कम है। इस तरह के संकेत हैं कि उन्हें राज्य की पॉलिटिक्स से दूर रखा जाएगा। इसका एक ही रास्ता है कि उन्हें राज्यपाल बना दिया जाए। आनंदीबेन पटेल को हटाकर जब विजय रूपाणी को सीएम बनाया गया था तो आनंदीबेन ने भी संगठन में काम करने की इच्छा जताई थी, लेकिन उनकी भी इच्छा पूरी नहीं हुई थी।
कहा तो यह जाता है कि उन्हें राज्यपाल बनवाने में खुद विजय रूपाणी की भी भूमिका थी। उन्हें लग रहा था कि आनंदीबेन के राज्य में सक्रिय राजनीति में होने से उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। वैसे राजनीति में इसे एक स्थापित परंपरा के रूप में देखा गया है कि जब किसी सीएम को उसकी इच्छा के विपरीत हटाया जाता है तो वह अपने उत्तराधिकारी के लिए बहुत सहज नहीं रहता। गुजरात की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है कि वहां विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं। यही कोई 16 से 18 महीने का वक्त बचा है।
विजय रूपाणी में बीएस येदियुरप्पा जैसा दम-खम नहीं दिखता कि राज्यपाल बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दें और कह दें कि उन्हें तो राज्य की सियासत में रहना है। केंद्रीय नेतृत्व जिस डर से येदियुरप्पा को कर्नाटक से बाहर करना चाह रहा था, उसका डर सही साबित हो रहा है। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद येदियुरप्पा वहां अपनी यात्रा शुरू करने जा रहे हैं।