सुंदरकांड; सीता ने रावण से कहा- जैसे तुम्हारी स्त्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, वैसे ही दूसरों की स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए… मैं प्राण दे दूंगी, पर तुम्हें नहीं स्वीकारूंगी
संवाद-1 : रावण-सीता
{ अशोकवाटिका में सीताजी को धमकाने पहुंचे रावण ने कहा- परायी स्रियों के पास जाना या बलात् उन्हें हर लाना राक्षसों का सदा ही धर्म रहा है।
{ सीता ने कहा- रावण! जैसे तुम्हारी स्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी तरह तुम्हें दूसरों की स्रियों की भी रक्षा करनी चाहिए।
परायी स्रियां चपल पुरुष को विनाश तक पहुंचा देती हैं। { रावण ने कहा- यदि दो महीने में आपने मुझे पति नहीं स्वीकारा तो मृत्युदंड दे दूंगा। { सीता ने कहा- भले मेरे प्राण चले जाएं, पर यह मुझे स्वीकार्य नहीं।
चुनौती: जब कोई पुरुष या महिला बलपूर्वक मर्यादा का उल्लंघन करने लगे।
सीख: जो गलत है, उसके सामने किसी भी दबाव में न झुकें। सत्य और संयम, सत्ता और भय से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। मर्यादा की रक्षा ही धर्म है।