त्याग, समर्पण, संघर्ष, उसूल, रसूख इनसे बुनकर तैयार हुईं लता मंगेशकर

त्याग, समर्पण, संघर्ष, उसूल, रसूख इनसे बुनकर तैयार हुईं लता मंगेशकर

लता दीदी की जिंदगी किसी बायोपिक की मुकम्मल स्क्रिप्ट है। इस स्क्रिप्ट में कुछ भी नाटकीय किए जाने की जरूरत नहीं, फिर भी मूवी सुपरहिट होने की गारंटी है।

अपने घर की सबसे बड़ी बेटी, आवाज मानो कोयल से भी मीठी, बच्ची अपने गुरु समान पिता को 13 साल की उम्र में ही खो देती है और सारे परिवार का जिम्मा अब उस पर ही होता है। मजबूरी में लता को फिल्म इंडस्ट्री में आना पड़ता है, लेकिन कुछ ही सालों में लता की आवाज हर सफल फिल्म की जरूरत बन जाती है। शख्सियत- उसूलों की इतनी पक्की कि बड़े-बड़े म्यूजिक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स से झगड़ा तक कर लिया

सिर्फ लता मंगेशकर नाम सुनते ही कानों को सुकून मिलता है, जुबान पर मिसरी चढ़ जाती है और दिल उनके गानों के बोल पर धड़कने लगता है। आज लता जी हमारे सामने विरासत छोड़कर चली गई हैं.

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