ठंड से कंपकंपाते पश्चिमी UP में कैराना से हिंदू परिवारों के पलायन की हवा फिर से गर्म हो चली है। यूं भी कह सकते हैं कि ये शोले कोहरे में ढके हुए थे, लेकिन चुनावी माहौल ने उन्हें फिर से भड़का दिया है। सच बात भी यही है कि कैराना में डर अभी भी जिंदा है। इस डर की वजह भी है। कैराना से पलायन की खबरें भले ही मुजफ्फरनगर दंगों के समय वायरल हुई हों, मगर इसका बड़ा कारण इस छोटे से कस्बे में फैली संगठित अपराध की विष बेल है।
आज इनमें से ज्यादातर अभी जेल में हैं और इन्हें संरक्षण देने के आरोपी विधायक भी जमानत के लिए भटक रहे हैं। फिर भी, अपराधियों का खौफ इतना ज्यादा है कि उस समय घरों पर ताले लगाकर गए परिवारों में कुछ ही लौटे हैं। जो लौटे हैं उन्हें भी ये डर सता रहा है कि निजाम बदलने के साथ कहीं खौफ का राज दोबारा न लौट आए।
2 साल बाद घर लौटे…मगर कैमरे पर पहचान बताने में डर
हम मूला पंसारी की उन दुकानों पर गए जिन्होंने दो साल पहले घर वापसी की है, कहने लगे कि हम वो लोग ही नहीं है, आप जिनके बारे में पूछ रहे हैं वो यहां नहीं रहते। कैसे मान सकते हैं? हमारे सामने मूला पंसारी के पड़पोते दुकान चला रहे थे। जब हमने कहा कि आप भले ही कैमरे पर कुछ ना बोलें, लेकिन अपनी पहचान तो न छुपाएं। कहने लगे, रहने दो जी, हम अपना जीवन चला रहे हैं यह क्या कम है? क्या बताएं कैसे सुबह 4 बजे अंधेरे में पूरा सामान समेट कर चुपचाप निकल गए थे। कमोबेश यही खामोशी हिंदू परिवारों के उन गलियों में भी हैं जहां अधिकांश मकानों पर ताले जड़े हैं और जिनमें लोग रहते हैं, वे बस खिड़की से ही झांक रहे हैं।