डॉ सुधीर कल्हन,डॉ सुविराज जॉन, डॉ मुकुंद खेतान, डॉ महेंद्र नरवरिया, डॉ परवीन भाटिया,डॉ दक्ष सेठी मिनिमल एक्सेस, मेटाबोलिक और बेरिएट्रिक सर्जरी संस्थान, सर गंगाराम अस्पताल, नई दिल्ली, भारत।
विश्वभर में मोटापे को 1990 के दशक के उत्तरार्ध से एक महामारी मान लिया गया है।1 विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का यह अनुमान है कि 2020 में 5 वर्ष से कम आयु के 39 मिलियन बच्चे अधिक वजन वाले या मोटे थे और 2016 में 5-19 वर्ष की आयु के 340 मिलियन से अधिक बच्चे और किशोर अधिक वजन वाले या मोटे थे। इन आंकड़ों के वैश्विक जन-स्वास्थ्य के लिए गंभीर निहितार्थ हैं, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि दुनिया की अधिकांश आबादी उन देशों में रहती है जहाँ वजन ज़्यादा होने और मोटापे से कम वजन वाले लोगों की तुलना में अधिक लोग मरते हैं।
2016 में की गई एक व्यवस्थित समीक्षा से यह पता चला है कि भारतीय बच्चों और किशोरों में अधिक वजन और मोटापे की दर न केवल ऊँचे सामाजिक-आर्थिक समूहों में बढ़ रही है, बल्कि वह उन निम्न आय समूहों में भी बढ़ रही है, जिनमें वजन कम होना एक बड़ी चिंता का विषय रहा है। इस विश्लेषण ने बचपन में मोटापे की व्यापकता को 16.3% (2005) से 19.3% (2010) तक बढ़ा दिया।