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देने के बाद रोना नहीं, बिना दिए सोना नहीं

चातुर्मास 21वां दिवस- नवकार भवन
दक्षिणापथ, दुर्ग।
ऋषभ नगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मास के तहत प्रतिदिन धर्म-ध्यान की चर्चा हो रही है। शांत क्रांति संघ के अतिरिक्त अन्य श्रावक-श्राविकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित हो कर धर्म लाभ ले रहे हैं। आज इक्कीसवें दिवस महाविदुषि श्री प्रभावती श्रीजी मसा ने दान की विधा को महान कर्म निरूपित करते हुए फरमाया कि समाज में तीन तरह के लोग होते हैं।
पहले वे जो हमेशा दान देने का भाव रखते हैं। इनके अंदर कुछ पाने का भाव नहीं होता। ऐसे श्रावक श्रेष्ठ कहलाते हैं। दूसरी श्रेणी के जो लोग होते हैं वे कुछ देते हैं तो समाज से कुछ लेते भी हैं। इस वर्ग में सेवक, कर्मचारी, शिक्षक और व्यापारी आते हैं जो सेवा के बदले मूल्य लेते हैं अथवा नाम व श्रेय लेने की इच्छा रखते हैं। तीसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो न्यूनतम लेते हैं और अधिकतम देते हैं। इस वर्ग में साधु-संत आते हैं जो समाज से नियमपूर्वक थोड़ी सी सामाग्री लेते हैं परंतु ज्ञान देकर मोक्ष का मार्ग बताते हैं। साधु-संतों के जीवन में संयम होता है, मर्यादा होती है इसीलिए सर्वत्र इनकी पूजा होती है। त्याग व तपस्या इनके आभूषण होते हैं, यही वजह है कि बड़े से बड़ा धनपति भी इनके समक्ष नतमस्तक होते हैं।
सांसारिक व गृहस्थ जीवन जीने वालों का जीवन कैसा होना चाहिए? इस पर प्रकाश डालते हुए तपस्विनी म.सा. ने बताया कि “देने के बाद रोना नहीं, देकर किसी से कहना नहीं, और बिना दिए सोना नहीं” मसा जी ने कहा इसी पर भारतीय संस्कृति टिकी हुई है। खिलाकर खाएं, यही हमारी संस्कृति रही है। मसा जी ने इस बात पर अफसोस ज़ाहिर किया कि वर्तमान दौर में लोग अपनी संस्कृति और मर्यादा भूलते जा रहे हैं। उन्होनें कहा समाज व संघ में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो दान देने की सार्वजनिक घोषणा तो कर देते हैं परंतु दान की राशि देने का समय आता है तो आगा-पीछा करने लगते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए। घोषणा कर दी तो यथाशीघ्र देकर अपना भार उतार लें। इसके बाद कोई चर्चा ना करें। दान देने के पश्चात कभी यह तुलना ना करें कि मैनें इतना दिया, फलां व्यक्ति ने इतना कम दिया आदि। लोग दान देकर धन का त्याग तो कर देते हैं परंतु नाम का त्याग नहीं कर पाते। चाहत होती है कि दान दिया है तो नाम भी होना चाहिए। ऐसी भावना अनुचित है। दान हमेशा छुपाकर देना चाहिए- छपा कर नहीं। लेकिन लोग प्रचार-प्रसार का लोभ त्याग नहीं पाते। थोड़ा देकर ज्यादा नाम की ख्वाहिश रखने वालों की संख्या आज की दुनिया में बहुत ज्यादा है। भगवान ने कहा है कि देने का भाव रखें। इससे पुण्य बढ़ता है और वही पुण्य मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
प्रारंभिक प्रवचन में महासती श्री अभिलाषा श्रीजी ने फरमाया की भगवान के बताए मार्ग पर चलने के लिए 12 व्रतधारी बनने का प्रयास करें। 12 व्रत का नियम कठिन लगता हो तो केवल एक नियम अहिंसा का लें और उसका जीवन मे पालन करें तो भी मोक्ष के द्वार तक पहुंचा सकता है। इसी तरह के विचार मंथन के लिए चातुर्मास का अवसर आता है। इस अवसर का का लाभ उठाते हुए तप करें, संयम का पालन करें और मर्यादा में रहने का भाव बनाएं। सांसारिक उपभोग की वस्तुओं के प्रति राब्ता ना पालें तो जीवन सुखमय बन जाएगा।