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श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला: मनुष्य पूर्व जन्म का संस्कार लेकर पैदा होता है- मुनि प्रशमरति विजय जी

दक्षिणापथ, नगपुरा/दुर्ग। ” मनुष्य में निहित आदतें पूर्व जन्म से हैं। मनुष्य पूर्व जन्म का संस्कार लेकर पैदा होता है। पूर्व संस्कारों के अनुरूप इस जन्म में भी वैसी आदतें होती हैं। जैन दर्शन के अनुसार दस प्रकार की संज्ञा का वर्णन है। आहार, भय, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, ओघ और लोक संज्ञा। यह दस संज्ञा ही सबसे बड़ी समस्या है। ” उक्त उद्गार श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा में चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में श्री आचारांग सूत्र की व्याख्या करते हुए पूज्य मुनि श्री प्रशमरति विजय जी (देवर्धि साहेब) ने व्यक्त किए। उन्होंने अपने मार्मिक उद्बोधन में कहा कि आप मनुष्य हो। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। मनुष्य के आसपास भीड़ स्वभाविक है। रिश्ते-नाते-सामाजिक कुटुम्ब आदि आदि का जमावड़ा रहता ही है। भीड़ आपके गुणों को नष्ट करने का प्रयास करेगा। भीड़ आपके गुणों को मिटाने का प्रयास करेगा। आपके गुणों का सर्जन स्वयं को करना होगा। अपने गुणों का संरक्षण स्वयं खुद को करना होगा। अपने गुणों का विकास भी स्वयं को ही करना होगा। ध्यान रखें आप किसी के द्वेष का निमित्त ना बने। आपका द्वेष किसी का निमित्त ना बने। अनादिकाल से दस संज्ञायें हमारे साथ जुड़ा हुआ है। इन संज्ञाओं के कारण अपने आत्मा से दूर हैं। गुण प्रकट होता है वह आत्मा की आवाज है। दोष प्रकट होता है वह कर्म की आवाज है। कर्म की आवाज को दबाना चाहिए। आत्मा की आवाज को उठने देना चाहिए। मनुष्य जन्म सुसंस्कारों के सर्जन के लिए है। कर्म की मलिनता को धोने के लिए किसी को नए कपड़े देना जैसे जरूरी है वैसे ही जरूरी होता है कि किसी को पुराने कपड़े धुलने के लिए पानी और साबुन दिया जाए । क्या है कि नए कपड़े एकदिन पुराने हो ही जाते है। जब कि पुराने कपड़े धुलने पर वापिस नए बन जाते हैं। हम किसी को सुख दें यह बाद में देखा जाता है पहले यह देखा जाता है हम किसी का दुःख मिटा दें। एक जीवन में आपने कितने लोगों को सुख दिया यह कम महत्त्वपूर्ण है। आपने कितने लोगों के दुःख मिटाये यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। आपकी वजह से किसी की पीड़ा या चिंता मिटे ऐसा होते रहना चाहिए। किसी को अपमान से बचाना, किसी को डर से बचाना, किसी को आफत से बचाना, किसी को अज्ञान से बचाना। ये हमारा काम है। जो आप के कारण अपने तनाव से मुक्त होता है वह आप को और आप के धर्म को धन्यवाद देता है। जो आप के कारण तनाव में फँसता है वह आप को और आप के धर्म को गाली देने लगता है। हमारी वजह से कोई चिंता मुक्त बने यह सुंदर घटना है। आपके संस्कार का साफल्य इसी में है कि आप परपीड़ा – परिहार की प्रवृत्ति अधिक से अधिक करें। आपके कारण किसी को पाप करना पड़े तो वह गलत काम है। आप के कारण किसी को पाप से मुक्ति मिल जाए यह सही काम है।कोई जब दुःख से या पाप से मुक्त बनता है तो उसे अंदर से खुशी मिलती है। आप ऐसी खुशी का निमित्त बनते ही रहें।